Sunday, January 16, 2011

उन पाउस



मावळतीला  मेघ  पेटले 
रवी  तरीही  निश्चल ,
चिता  सोबत्यांच्या  लागल्या 
अश्रू  तरीही  अचल .

धरणी  येता  काकुळतीला 
सागर  मागे  क्षमायाचना ,
तसू भरही  न  ढळे  आदित्याची 
अतिदिव्य  अग्निसाधना .

रूप  बदलूनी  गुलमोहर  बहावा 
उभा  करी  सुंदर  देखावा ,
उमदे  देखणे  रूप  परी 
हरित पर्णाशी  कसला  दुरावा .

मृग नक्षत्राचा फुलता  पिसारा 
सुखावे  अवघी  सृष्टी  ,
सांध्यक्षणी  तो  सोसाट वारा   
अधू  करीतसे  माझी  दृष्टी .

आकाश सोबती दाटून  येती 
लपून  जाई  अखंड  निळाई ,
क्षणात  समजे  खेळ  सारा 
जशी  काही  वीज  चमकावी .

पोचता  जलधारा  जमिनीवरी 
मीलन  होई  आसमंताशी  ,
सागरा  येईये  आनंद उधाण   
हलकेच  तरीही  पाझरे  पाषाण .

सांज सकाळी कधी अवेळी
हिरमुसलेल्या एकांतवेळी ,
मीच  माझ्याशी 
उन पाऊसाचा  खेळ खेळी.

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