Friday, March 30, 2012

अंधेरा कायम रहे

मैं कौन हूँ?
क्या जानू?

मैं खुद अँधेरा हूँ,
या फिर उसकी नाजायज औलाद,
परछाई
बनके घूम रहा हूँ इस दुनिया में.........1


तकलीफ होती है,
सूरज को देखकर.

जब भी चाँद छा जाता है उसपर,
पलभर के लिए ही सही,
एक लहर सी दौड़ती है,
दिल-ओ-दिमाग में...........2


रौशनी से दूर,
एक कोने में बैठा रहता हूँ.

बात करना चाहता हूँ,
अपने आप से,
लेकिन अल्फाजोंकी जगह,
धुआ आता हैं.
सुन नहीं पता मैं
एक  रंजिश को भी.........3


रात पश्मीने की तरह,
मुलायम.
गोद में लेती हैं मुझे.
चैन की नींद.
दोनों, हाथ में हाथ लेकर
ख्वाबों में जाते है.......4


रुक जाती है रात,
सेहर के किसी मोड़ पर.

पागलोंकी तरह ढुंड़ता  रहता हूँ,
अंधेरा बनके,
अपनी ही परछाई को.


2 comments:

  1. kya baat hai!!!
    tu lihilayas ka Gulzar ni asa prashna padava itaka bhaari zala ahe he!!!

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